संस्कारों के बारे में विस्तृत और स्पष्ट जानकारी

संस्कारों के बारे में

संस्कारों के बारे में विस्तृत और स्पष्ट जानकारी निम्नलिखित है

संस्कारों के बारे में विस्तृत और स्पष्ट जानकारी

भारत में संस्कारों का प्रचलन वैदिक काल से ही रहा है, तथापि इनका विवरण वैदिक साहित्य में नहीं मिलता।सूत्रग्रंथों और स्मृति-ग्रंथों में इनके विषय में विस्तार से विवरण मिलता है। प्रायः सभी धर्मशास्त्रकार संस्कारों की संख्या 18 मानते हैं,जो इस प्रकार है-

1. गर्भाधान संस्कार– गौतम और बोधायन आदि व्यवस्था का रोल के अनुसार यह प्रथम संस्कार है।गर्भ धारण अथवा वीर्य की गर्भाशय में स्थापना जिस क्रिया से होती है, उसको गर्भाधान संस्कार कहते हैं।

2.पुंसवन संस्कार- गर्भ में स्थित शिशु को रूप देने के लिए यह संस्कार किया जाता है इसे देवताओं की स्तुति कर उनसे पुत्र-प्राप्ति की याचना की जाती है।

3.सीमन्तोन्नयन संस्कार- यह संस्कार गर्भ के उपरांत तीसरे या चौथे महीने में सम्पन्न किया जाता है। इस संस्कार में पति के द्वारा पत्नी के केशपाल को सजाकर उसमें सीमांत या मांग काङी जाती है। इसे सीमन्तोन्नयन कहते हैं।

4.जातकर्म संस्कार- यह संस्कार पुत्र जन्म होता है इस अवसर पर पिता नवजात शिशु को स्पर्श करता है उससे स्वर्ण- मिश्रित घृत तथा मधु खिलाता है उसके कानों में मेघा जन्न पढ़ता है और इसे आशीर्वाद देता है परिवार के अन्य लोग भी शिशु को आशीर्वाद देते हैं।

5.नामकरण संस्कार- इस संस्कार में शिशु का नाम रखा जाता है। पिता दो या चार अक्षरों का सुंदर नाम रखता है। इसमें उस समय गृह- शुद्धि के लिए हवन, भोज आदि किए जाते हैं। यह संस्कार जन्म के 10वें अथवा 12वें दिन होना चाहिए।

6.निष्क्रमण संस्कार- जन्म के चौथै मास में शिशु को पहली बार घर से बाहर निकालने की क्रिया निष्क्रमण संस्कार है इसमें शिशु को घर से बाहर लाकर दिन में सूर्य तथा रात्रि में चंद्रमा के दर्शन कराए जाते हैं।

7.अन्न-प्राशन संस्कार- छठे महीने में शिशु को पहली बार आहार देने की क्रिया अन्न-प्राशन संस्कार के रूप में मनाई जाती है। शिशु को शुरू में भात, मधु, दही और घृत का मिश्रित भोजन दिया जाता है।

8.चूङाकर्म संस्कार- इसे केशोच्छेदन संस्कार भी कहा जाता है। जन्म के पहले या तीसरे वर्ष में शिशु के जन्म के बालों को कटवा कर सिर पर केवल शिखा छोड़ दी जाती है शिखा छोटी रखने का प्रारंभ इसी संस्कार से होता है।

9. कर्णवेध संस्कार- यह संस्कार जन्म के तीसरे या पांचवें वर्ष में किया जाता है शिशु को स्नान कराकर वस्त्र पहनाए जाते हैं और फिर अच्छे वैद्य द्वारा पहले दाहिने कान को फिर बाएं कान को बेधा जाता है इस संस्कार का भी स्वास्थ्य की दृष्टि से महत्व है। कान के छेद से कुंडल लटकाने की सुविधा हो जाती है।

10. उपनयन संस्कार- इसे यज्ञोपवीत संस्कार भी कहा जाता हैं 16 संस्कारों में उपनयन संस्कार अत्यधिक महत्वपूर्ण है। यह वह संस्कार है जिसके द्वारा बालक को शिक्षा के लिए गुरु के समीप ले जाया जाता था।

11. समावर्तन संस्कार- ब्रह्मचर्य आश्रम की समाप्ति समावर्तन संस्कार से होती है। इस संस्कार में विद्यार्थी आचार्य को दक्षिणा देकर उसका आशीर्वाद ग्रहण करता है और स्नान करता है विद्या अध्ययन की समाप्ति पर ही इसका विधान है। इसे एक दीक्षांत संस्कार भी कह सकते हैं।

12.विवाह संस्कार- हिंदू समाज विवाह का महत्वपूर्ण स्थान है। जिसे एक धार्मिक संस्कार के रूप में ग्रहण किया जाता है। जिसका उद्देश्य उन विभिन्न पुरुषार्थों को पूरा करना है जिसकी प्राप्ति में पति और पत्नी दोनों का सहयोग होता है गृहस्थ जीवन का प्रारंभ विवाह से ही होता है इसके अंतर्गत स्त्री पुरुष का मात्र यौन संबंध ही नहीं आता बल्कि उसके धार्मिक, सामाजिक और सांस्कृतिक क्रियाएं भी आती है।

13.केशान्त संस्कार

गुरुकुल में वेदाध्ययन पूर्ण कर लेने पर आचार्य के समक्ष यह संस्कार सम्पन्न किया जाता था। वस्तुत: यह संस्कार गुरुकुल से विदाई लेने तथा गृहस्थाश्रम में प्रवेश करने का उपक्रम है। वेद-पुराणों एवं विभिन्न विषयों में पारंगत होने के बाद ब्रह्मचारी के समावर्तन संस्कार के पूर्व बालों की सफाई की जाती थी तथा उसे स्नान कराकर स्नातक की उपाधि दी जाती थी। केशान्त संस्कार शुभ मुहूर्त में किया जाता था।

 14. वानप्रस्थ संस्कार- हिंदू धर्म में मनुष्य की आयु 100 वर्ष मानी गई है। इन सौ वर्षों को चार आश्रमों में विभाजित किया गया है। प्रथम 25 वर्ष ब्रह्मचर्य के रूप में माना गया है इसके पश्चात 50 वर्ष तक गृहस्थ आश्रम के होते हैं। इस अवस्था तक व्यक्ति अपनी तीसरी पीढ़ी को देखने में सक्षम हो जाता है। इसकी संतान अब पारिवारिक दायित्वों का पालन करने में सक्षम हो जाती है इसलिये आगे का जीवन समाज को समर्पित करने का होता है। इसलिये 50 की उम्र से 75 की आयु तक वानप्रस्थ आश्रम का पालन किया जाता है। 75 की आयु के पश्चात श्रुति ग्रंथों में सन्यास ग्रहण करवाये जाने का विधान है जिसका मृत्यु पर्यन्त पालन करना होता है। वानप्रस्थ आश्रम से सन्यास आश्रम में प्रवेश विधि-विधान से करवाया जाता है यही सन्यास संस्कार कहलाता है। हिंदू धर्म में गर्भाधान से लेकर अंत्येष्टि तक सोलह संस्कार बताये जाते हैं सन्यास इनमें पंद्रहवां संस्कार है। 

15. सन्यासी संस्कार- घर की जिम्मेदारियों तथा शीघ्र करके उत्तराधिकारीयो को अपने कार्य सौंपकर अपने व्यक्तित्व को धीरे-धीरे सामाजिक, उत्तरदायित्व पारमार्थिक कार्यों में पूरी तरह लगा देने के लिए वानप्रस्थ संस्कार करवाया जाता है।

16. अंन्त्येष्टि संस्कार- यह जीवन का अंतिम संस्कार है। इस संस्कार में वैदिक मंत्रों के साथ अग्नि को सौंप दिया जाता है इस संस्कार में मृतक के शरीर को स्नान करा कर अर्थी पर लिटा कर शमशान ले जाया जाता है वहां पर चिता पर रखा जाता है फिर मंत्रोच्चारण के साथ अग्नि को अर्पित कर दिया जाता है।

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